3. कुण्डलिनी जागरण क्या है?
3. कुण्डलिनी जागरण क्या है?

कुण्डलिनी जागरण वह दिव्य आध्यात्मिक प्रक्रिया है जिसमें मनुष्य के भीतर मूलाधार चक्र में सुप्त अवस्था में स्थित कुण्डलिनी शक्ति सक्रिय होकर सुषुम्ना नाड़ी के माध्यम से ऊपर की ओर गतिशील होती है। योगशास्त्र, तंत्रशास्त्र तथा सिद्ध महायोग परंपरा में इसे मानव जीवन की सर्वोच्च आध्यात्मिक घटनाओं में से एक माना गया है। इसका उद्देश्य केवल विशेष अनुभव प्राप्त करना नहीं, बल्कि साधक को उसके वास्तविक आत्मस्वरूप का बोध कराना है।
सामान्य अवस्था में मनुष्य का मन बाहरी संसार, इच्छाओं, वासनाओं तथा मानसिक विकारों में उलझा रहता है। कुण्डलिनी जागरण के पश्चात यही शक्ति साधक के चित्त का शुद्धीकरण प्रारम्भ करती है। इससे मन धीरे-धीरे अंतर्मुखी होता है, विचारों की अशांति कम होती है और ध्यान में स्थिरता आने लगती है। साधक के भीतर संचित संस्कार एवं मानसिक अशुद्धियाँ क्रमशः समाप्त होने लगती हैं।
सिद्ध महायोग परंपरा के अनुसार शक्तिपात दीक्षा के माध्यम से सद्गुरु की कृपा से कुण्डलिनी जागरण सहज और सुरक्षित रूप से प्रारम्भ हो सकता है। जागरण के दौरान प्रत्येक साधक के अनुभव अलग हो सकते हैं। किसी को ध्यान में गहन शांति का अनुभव होता है, किसी को शरीर में कंपन, स्वतः होने वाली क्रियाएँ, आनंद, मौन अथवा दिव्य चेतना का स्पर्श अनुभव हो सकता है। इन अनुभवों का उद्देश्य साधक के चित्त को शुद्ध करना है, न कि चमत्कार दिखाना।
अंततः कुण्डलिनी जागरण साधक को आत्मबोध, ईश्वर के प्रति गहन प्रेम तथा स्थायी आंतरिक शांति की ओर अग्रसर करता है।