पूज्य श्री 1008 दण्डी स्वामी नित्यमुक्तानन्द तीर्थ जी महाराज

पूज्य श्री 1008 दण्डी स्वामी नित्यमुक्तानन्द तीर्थ जी महाराज

पूज्य श्री 1008 दण्डी स्वामी नित्यमुक्तानन्द तीर्थ जी महाराज

सिद्ध महायोग, शक्तिपात एवं श्रीविद्या परंपरा के तेजस्वी आचार्य

पूज्य श्री 1008 दण्डी स्वामी नित्यमुक्तानन्द तीर्थ जी महाराज सिद्ध महायोग, शक्तिपात, श्रीविद्या एवं वेदान्त परंपरा के प्रतिष्ठित आचार्य हैं। वे परम पूज्य स्वामी शिवोम तीर्थ महाराज के शिष्य तथा वेदमूर्ति श्री उमेश रमेश कुलकर्णी गुरुजी के पूज्य गुरुदेव हैं।

पूरा परिचय पढ़ें

पूज्य श्री 1008 दण्डी स्वामी नित्यमुक्तानन्द तीर्थ जी महाराज

सिद्ध महायोग, शक्तिपात एवं श्रीविद्या परंपरा के तेजस्वी आचार्य

“गुरु केवल ज्ञान देने वाले आचार्य नहीं होते, वे साधक के अंतःकरण में सुप्त चेतना का जागरण कर उसे आत्मसाक्षात्कार के पथ पर अग्रसर करने वाले दिव्य पथप्रदर्शक होते हैं।”

भारतीय सनातन परंपरा में गुरु का स्थान ईश्वर के समान माना गया है। जब सद्गुरु की कृपा साधक के जीवन में उतरती है, तभी उसके भीतर सुप्त आध्यात्मिक शक्ति जागृत होती है और जीवन का वास्तविक उद्देश्य स्पष्ट होता है। इसी महान गुरु-परंपरा के तेजस्वी संत हैं पूज्य श्री 1008 दण्डी स्वामी नित्यमुक्तानन्द तीर्थ जी महाराज, जो आज सिद्ध महायोग, शक्तिपात, श्रीविद्या एवं वेदान्त परंपरा के प्रतिष्ठित आचार्य के रूप में देश-विदेश के साधकों का मार्गदर्शन कर रहे हैं।

पूज्य स्वामी जी का जन्म बिहार राज्य के आरा (अराह) जिले में एक धार्मिक एवं संस्कारित परिवार में हुआ। बचपन से ही उनका मन ईश्वर-भक्ति, ध्यान, जप, वैराग्य तथा आध्यात्मिक साधना की ओर आकृष्ट था। सांसारिक विषयों की अपेक्षा उनका मन संतों के सान्निध्य और आध्यात्मिक चिंतन में अधिक रमता था। यही संस्कार आगे चलकर उन्हें संन्यास और उच्चकोटि की साधना के मार्ग पर ले गए।

उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय तब प्रारम्भ हुआ जब उन्हें परम पूज्य श्री 1008 स्वामी शिवोम तीर्थ महाराज का सान्निध्य एवं गुरु-कृपा प्राप्त हुई। पूज्य स्वामी शिवोम तीर्थ महाराज, सर्वकालीन वंदनीय परम पूज्य श्री विष्णुतीर्थ जी स्वामी महाराज की दिव्य गुरु-परंपरा के तेजस्वी आचार्य थे। उन्हीं के श्रीचरणों में पूज्य नित्यमुक्तानन्द तीर्थ जी महाराज ने शिष्यत्व स्वीकार किया और गुरु-आज्ञा को अपने जीवन का सर्वोच्च धर्म मानकर साधना का पथ अपनाया।

संन्यास ग्रहण करने से पूर्व उनका नाम कमलेश ओझा था। देवास स्थित नारायण कुटी में परम पूज्य स्वामी शिवोम तीर्थ महाराज ने उन्हें संन्यास दीक्षा प्रदान की और नया संन्यासी नाम “स्वामी नित्यमुक्तानन्द तीर्थ” दिया। यह केवल नाम परिवर्तन नहीं था, बल्कि सांसारिक जीवन से पूर्ण वैराग्य लेकर आध्यात्मिक साधना के लिए समर्पित होने का एक दिव्य संस्कार था।

संन्यास के उपरांत गुरुदेव ने उन्हें बाबई आश्रम का दायित्व सौंपा। बाबई आश्रम एक स्वतंत्र साधना केन्द्र था, जहाँ साधना, ध्यान और गुरु-सेवा का विशेष वातावरण था। स्वामी नित्यमुक्तानन्द तीर्थ जी ने वहाँ अत्यंत निष्ठा, अनुशासन और समर्पण के साथ आश्रम व्यवस्था, साधना एवं साधकों के मार्गदर्शन का कार्य संभाला। कुछ वर्षों तक इस उत्तरदायित्व का निर्वहन करने के पश्चात उन्होंने एकांत तपस्या के उद्देश्य से हिमालय की ओर प्रस्थान किया।

हिमालय की पवित्र भूमि पर उन्होंने अनेक सिद्ध संतों एवं महात्माओं का सान्निध्य प्राप्त किया। इस अवधि में उन्होंने कामाख्या सहित अनेक सिद्ध शक्तिपीठों का भ्रमण किया तथा उच्चकोटि के साधकों से आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त किए। वर्षों की तपस्या के पश्चात वे पुनः मध्यप्रदेश लौटे, परन्तु बाबई आश्रम में न रहकर श्री तेज सिंह तंवर के खेत पर एकांत साधना एवं भजन में लीन रहे। उनका सम्पूर्ण जीवन बाहरी प्रसिद्धि से दूर रहकर साधना और गुरु-सेवा को समर्पित रहा।

समय के साथ अनेक जिज्ञासु और साधक उनके सान्निध्य में आने लगे। उनके शिष्यों एवं भक्तों के सहयोग से कोटेश्वर आश्रम की स्थापना का संकल्प लिया गया। साधकों की श्रद्धा और गुरु-कृपा से इस आश्रम की नींव रखी गई और धीरे-धीरे यह सिद्ध महायोग, शक्तिपात, श्रीविद्या एवं आध्यात्मिक साधना का एक महत्वपूर्ण केन्द्र बन गया। आज भी देश-विदेश से आने वाले साधकों के लिए यह आश्रम श्रद्धा, साधना और आत्मजागरण का पवित्र तीर्थ बना हुआ है।

पूज्य स्वामी जी सिद्ध महायोग की उस दिव्य परंपरा के प्रतिनिधि हैं जिसमें शक्तिपात दीक्षा के माध्यम से साधक की सुप्त कुण्डलिनी शक्ति के जागरण का मार्ग प्रशस्त किया जाता है। उनके अनुसार शक्तिपात कोई सामान्य धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सद्गुरु की कृपा से साधक की अंतःचेतना को जागृत करने वाली दिव्य प्रक्रिया है। वे साधकों को नियमित ध्यान, जप, गुरु-स्मरण, आत्मचिंतन और सात्त्विक जीवन अपनाने की प्रेरणा देते हैं।

सिद्ध महायोग के साथ-साथ पूज्य स्वामी जी श्रीविद्या साधना के भी प्रतिष्ठित आचार्य हैं। उन्होंने अनेक योग्य साधकों को श्रीविद्या की दीक्षा प्रदान कर इस गूढ़ आध्यात्मिक परंपरा को जीवंत बनाए रखा है। वर्ष 2024 में उन्होंने श्रीमती उर्मिला कुंवर तंवर को श्रीविद्या दीक्षा प्रदान की, जो उनकी गुरु-कृपा का एक महत्वपूर्ण प्रसंग माना जाता है।

आध्यात्मिक साधना के साथ-साथ उनका झुकाव भारतीय दर्शन के गहन अध्ययन की ओर भी रहा। वर्ष 2008–2009 में उनके मार्गदर्शन में विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के दर्शनशास्त्र विभाग में “कुण्डलिनी शक्ति द्वारा तनाव प्रबंधन के सूत्र” विषय पर एम.ए. का लघु शोधकार्य सम्पन्न हुआ। यह शोध भारतीय योग परंपरा एवं आधुनिक जीवन में मानसिक संतुलन के लिए आध्यात्मिक साधना के महत्व को रेखांकित करता है।

उनके अनेक शिष्यों ने उनके जीवन से जुड़े प्रेरणादायक अनुभव साझा किए हैं। अनेक साधकों के अनुसार स्वामी जी की सहज दृष्टि, आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि और करुणामय मार्गदर्शन ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। उन्होंने कोटेश्वर स्थित स्वयंभू शिवलिंग के पीछे विद्यमान मालिनी यंत्र के आध्यात्मिक रहस्य को भी विस्तार से समझाया तथा उसके प्राचीन महत्व पर प्रकाश डाला। उनके प्रवचनों में वेद, उपनिषद, भगवद्गीता, वेदान्त, सिद्ध महायोग, शक्तिपात और श्रीविद्या का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।

पूज्य श्री 1008 दण्डी स्वामी नित्यमुक्तानन्द तीर्थ जी महाराज के अनेक शिष्य आज विभिन्न स्थानों पर गुरु-परंपरा के आदर्शों का पालन करते हुए साधना एवं सेवा के कार्य में संलग्न हैं। उनमें वेदमूर्ति श्री उमेश रमेश कुलकर्णी गुरुजी का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वेदमूर्ति श्री उमेश रमेश कुलकर्णी गुरुजी ने उनके श्रीचरणों में रहकर सिद्ध महायोग, शक्तिपात एवं गुरु-परंपरा का अध्ययन एवं साधना की। पूज्य गुरुदेव की असीम कृपा से 23 मई 2023 को सोनकच्छ आश्रम में उन्हें “कुण्डलिनी सिद्ध महायोग शक्तिपात दीक्षा” प्रदान करने का दीक्षाधिकार प्रदान किया। यह केवल एक सम्मान नहीं, बल्कि गुरु-परंपरा द्वारा सौंपा गया एक महान आध्यात्मिक उत्तरदायित्व है। आज वे अपने पूज्य गुरुदेव के आशीर्वाद से योग्य साधकों को शक्तिपात दीक्षा प्रदान करते हुए सिद्ध महायोग की पावन परंपरा के प्रचार-प्रसार में समर्पित भाव से कार्य कर रहे हैं।

पूज्य श्री 1008 दण्डी स्वामी नित्यमुक्तानन्द तीर्थ जी महाराज का सम्पूर्ण जीवन गुरु-भक्ति, तप, साधना, करुणा और आत्मजागरण का दिव्य उदाहरण है। उन्होंने अपने जीवन के प्रत्येक क्षण को साधकों के आध्यात्मिक उत्थान, गुरु-परंपरा की सेवा तथा मानव कल्याण के लिए समर्पित किया है। उनके सान्निध्य से असंख्य साधकों ने साधना की प्रेरणा, आत्मिक शांति और गुरु-कृपा का अनुभव किया है। आज भी वे सिद्ध महायोग की अखंड ज्योति को प्रज्वलित रखते हुए आने वाली पीढ़ियों को सनातन आध्यात्मिक परंपरा का प्रकाश प्रदान कर रहे हैं।

“गुरु-कृपा ही साधना का प्राण है, साधना ही आत्मजागरण का मार्ग है और आत्मजागरण ही मानव जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि है।” 🙏🌸

पूज्य श्री १००८ दंडी स्वामी नित्यमुक्तानंद तीर्थजी महाराज

सिद्ध महायोग, शक्तिपात आणि श्रीविद्या परंपरेचे तेजस्वी आचार्य

पूज्य स्वामीजी हे परमपूज्य स्वामी शिवोम तीर्थ महाराजांचे शिष्य आणि वेदमूर्ती श्री उमेश रमेश कुलकर्णी गुरुजींचे पूज्य गुरुदेव आहेत. सिद्ध महायोग, शक्तिपात, श्रीविद्या आणि वेदान्त परंपरेतून ते साधकांना मार्गदर्शन करीत आहेत.

संपूर्ण चरित्र वाचा

पूज्य श्री १००८ दंडी स्वामी नित्यमुक्तानंद तीर्थजी महाराज हे सिद्ध महायोग, शक्तिपात, श्रीविद्या आणि वेदान्त परंपरेतील प्रतिष्ठित आचार्य आहेत. त्यांचा जन्म बिहारमधील आरा जिल्ह्यात धार्मिक आणि संस्कारित कुटुंबात झाला. बालपणापासूनच त्यांना ईश्वरभक्ती, ध्यान, वैराग्य आणि संतसंग यांची विशेष आवड होती.

संन्यासपूर्व त्यांचे नाव कमलेश ओझा होते. देवास येथील नारायण कुटीमध्ये परमपूज्य स्वामी शिवोम तीर्थ महाराजांकडून त्यांनी संन्यास दीक्षा घेतली. गुरुदेवांनी त्यांना “स्वामी नित्यमुक्तानंद तीर्थ” हे संन्यासनाम दिले आणि बाबई आश्रमाची जबाबदारी सोपवली.

काही वर्षे आश्रमसेवा केल्यानंतर त्यांनी हिमालयात जाऊन एकांत तपश्चर्या केली. त्यांनी कामाख्यासह अनेक शक्तिपीठे आणि तपोभूमींची यात्रा केली. पुढे मध्यप्रदेशात परतल्यानंतर त्यांनी साधना आणि भजनात स्वतःला वाहून घेतले.

त्यांच्या शिष्यांनी पुढे कोटेश्वर आश्रमाची स्थापना केली. आज हा आश्रम सिद्ध महायोग, शक्तिपात, श्रीविद्या आणि आध्यात्मिक साधनेचे महत्त्वपूर्ण केंद्र आहे.

स्वामीजी नियमित ध्यान, जप, गुरु-स्मरण, आत्मनिरीक्षण आणि सात्त्विक जीवन यांवर भर देतात. ते श्रीविद्या साधनेचेही प्रतिष्ठित आचार्य आहेत.

वर्ष 2008–2009 मध्ये त्यांच्या मार्गदर्शनाखाली विक्रम विद्यापीठ, उज्जैन येथे “कुंडलिनी शक्तीद्वारे तणाव व्यवस्थापन” या विषयावर लघु संशोधन झाले.

पूज्य स्वामीजी हे वेदमूर्ति श्री उमेश रमेश कुलकर्णी गुरुजींचे पूज्य गुरुदेव आहेत. त्यांच्या सान्निध्यात गुरुजींनी सिद्ध महायोग, शक्तिपात आणि श्रीविद्या परंपरेचा अभ्यास व साधना केली.

त्यांचे जीवन साधना, करुणा, गुरु-भक्ती आणि आत्मजागरणाचे उज्ज्वल उदाहरण आहे.

Revered Shri 1008 Dandi Swami Nityamuktanand Tirth Ji Maharaj

A Radiant Acharya of Siddha Mahayog, Shaktipat and Sri Vidya

Revered Swami Ji is a disciple of His Holiness Swami Shivom Tirth Maharaj and the revered Gurudev of Vedamurti Shri Umesh Ramesh Kulkarni Guruji. He guides seekers in Siddha Mahayog, Shaktipat, Sri Vidya and Vedanta.

Read full biography

Revered Shri 1008 Dandi Swami Nityamuktanand Tirth Ji Maharaj is a respected Acharya of Siddha Mahayog, Shaktipat, Sri Vidya and Vedanta. He was born in the Ara district of Bihar in a religious and cultured family. From childhood he was attracted to devotion, meditation, renunciation and the company of saints.

Before taking sannyasa his name was Kamlesh Ojha. At Narayan Kuti in Dewas he received sannyasa initiation from His Holiness Swami Shivom Tirth Maharaj, who gave him the name “Swami Nityamuktanand Tirth” and entrusted him with the responsibility of Babai Ashram.

After serving at the ashram for several years, he travelled to the Himalayas for solitary spiritual practice. During this period he visited Kamakhya and many sacred Shakti Peethas and places of tapasya.

Later, with the devotion and cooperation of his disciples, Koteshwar Ashram was established. It has grown into an important centre for Siddha Mahayog, Shaktipat, Sri Vidya and spiritual practice.

Swami Ji emphasizes regular meditation, mantra-japa, remembrance of the Guru, self-observation and a sattvic way of life. He is also a respected teacher of Sri Vidya.

During 2008–2009, a research project on “Stress Management through Kundalini Shakti” was completed under his guidance at Vikram University, Ujjain.

Revered Swami Ji is the Gurudev of Vedamurti Shri Umesh Ramesh Kulkarni Guruji. Under his guidance, Guruji studied and practised Siddha Mahayog, Shaktipat and Sri Vidya.

His life remains a radiant example of discipline, compassion, guru-bhakti and inner awakening.