1. कुण्डलिनी या दिव्य शक्ति क्या है?
1. कुण्डलिनी या दिव्य शक्ति क्या है?

कुण्डलिनी प्रत्येक मनुष्य के भीतर विद्यमान परम दिव्य चेतना की सुप्त शक्ति है। योगशास्त्र, तंत्रशास्त्र तथा सिद्ध महायोग परंपरा में इसे ईश्वर द्वारा प्रत्येक जीव को प्रदान की गई आध्यात्मिक ऊर्जा माना गया है। यह शक्ति मेरुदण्ड (रीढ़) के सबसे निचले भाग, जिसे मूलाधार चक्र कहा जाता है, वहाँ सुप्त अवस्था में स्थित रहती है। शास्त्रों में इसे प्रतीकात्मक रूप से साढ़े तीन कुंडलियों में लिपटे हुए दिव्य सर्प के रूप में दर्शाया गया है। यह केवल एक प्रतीक है, जिसका उद्देश्य इस शक्ति की सुप्त अवस्था को समझाना है।
मानव शरीर केवल स्थूल शरीर नहीं है, बल्कि इसके भीतर एक सूक्ष्म ऊर्जा तंत्र भी कार्य करता है। इस सूक्ष्म तंत्र में इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नामक तीन प्रमुख नाड़ियाँ तथा सात मुख्य चक्र वर्णित हैं। इनमें सुषुम्ना नाड़ी को आध्यात्मिक उन्नति का प्रमुख मार्ग माना जाता है। जब सद्गुरु की कृपा से कुण्डलिनी जागृत होती है, तब यह सुषुम्ना मार्ग से ऊपर की ओर बढ़ते हुए विभिन्न चक्रों को क्रमशः सक्रिय करती है तथा सूक्ष्म नाड़ियों का शुद्धीकरण करती है।
सामान्य अवस्था में अधिकांश लोगों के चक्र पूर्ण रूप से जागृत नहीं होते, इसलिए मनुष्य अपनी वास्तविक आध्यात्मिक क्षमता का अनुभव नहीं कर पाता। कुण्डलिनी जागरण के साथ साधक का मन अधिक शांत, अंतर्मुखी और जागरूक होने लगता है। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे उसके भीतर संचित संस्कारों, मानसिक अशुद्धियों एवं आध्यात्मिक अवरोधों को दूर करती है।
सिद्ध महायोग परंपरा के अनुसार कुण्डलिनी का उद्देश्य केवल अलौकिक अनुभव प्राप्त करना नहीं, बल्कि साधक को उसके वास्तविक आत्मस्वरूप का अनुभव कराना है। जब यह दिव्य शक्ति जागृत होकर सहस्रार की ओर अग्रसर होती है, तब साधक का जीवन आध्यात्मिक रूप से परिवर्तित होने लगता है। इसलिए कुण्डलिनी को केवल ऊर्जा नहीं, बल्कि आत्मबोध और परम चेतना तक पहुँचने का दिव्य सेतु माना गया है।