परम पूज्य स्वामी विष्णु तीर्थजी महाराज

His Holiness Swami Vishnu Tirthji

परम पूज्य स्वामी विष्णु तीर्थजी महाराज

15 अक्टूबर 1888 – 1969

परमपूज्य स्वामी विष्णु तीर्थजी महाराज

15 ऑक्टोबर 1888 – 1969

His Holiness Swami Vishnu Tirthji

15 October 1888 – 1969

स्वामी विष्णु तीर्थजी, जिन्हें प्रारंभिक जीवन में मुनिलाल स्वामी के नाम से जाना गया, सिद्धयोग की शक्तिपात परंपरा के महत्वपूर्ण संन्यासी, लेखक और गुरु थे। उनका जन्म 15 अक्टूबर 1888 को हरियाणा के झज्जर में हुआ। उन्होंने स्नातक शिक्षा प्राप्त की, विवाह किया और छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में शिक्षक के रूप में कार्य करते हुए उच्च शिक्षा जारी रखी। उन्होंने स्नातकोत्तर तथा विधि की पढ़ाई पूर्ण की और बाद में गाजियाबाद में वकालत की। पारिवारिक उत्तरदायित्व पूर्ण करने और पत्नी के निधन के बाद वे आत्मज्ञान की खोज में ऋषिकेश पहुँचे। वर्ष 1933 में स्वर्गाश्रम में उन्हें योगानंद महाराज से शक्तिपात दीक्षा मिली। बाद में स्वामी शंकर…

पूरा परिचय पढ़ें

स्वामी विष्णु तीर्थजी, जिन्हें प्रारंभिक जीवन में मुनिलाल स्वामी के नाम से जाना गया, सिद्धयोग की शक्तिपात परंपरा के महत्वपूर्ण संन्यासी, लेखक और गुरु थे। उनका जन्म 15 अक्टूबर 1888 को हरियाणा के झज्जर में हुआ। उन्होंने स्नातक शिक्षा प्राप्त की, विवाह किया और छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में शिक्षक के रूप में कार्य करते हुए उच्च शिक्षा जारी रखी। उन्होंने स्नातकोत्तर तथा विधि की पढ़ाई पूर्ण की और बाद में गाजियाबाद में वकालत की।

पारिवारिक उत्तरदायित्व पूर्ण करने और पत्नी के निधन के बाद वे आत्मज्ञान की खोज में ऋषिकेश पहुँचे। वर्ष 1933 में स्वर्गाश्रम में उन्हें योगानंद महाराज से शक्तिपात दीक्षा मिली। बाद में स्वामी शंकर पुरुषोत्तम तीर्थ से संन्यास दीक्षा लेकर वे स्वामी विष्णु तीर्थ बने। गुरु के निर्देश से वे देवास पहुँचे और नारायण कुटी संन्यास आश्रम की स्थापना की।

उन्होंने अनेक साधकों को शक्तिपात दीक्षा दी और कई ग्रंथ लिखे। उनका प्रसिद्ध अंग्रेज़ी ग्रंथ “Devatma Shakti” कुंडलिनी शक्ति और शक्तिपात विज्ञान का गहन विवेचन है। उनका स्पष्ट मत था कि वास्तविक आध्यात्मिक प्रगति के लिए कुंडलिनी जागरण आवश्यक है और समर्थ गुरु की शक्तिपात दीक्षा उसका सहज मार्ग हो सकती है।

उन्हें गंगा से गहरा प्रेम था और वे प्रतिवर्ष कुछ समय ऋषिकेश के योग श्री पीठ आश्रम में रहते थे। वर्ष 1969 में उन्होंने देह त्याग किया।

परमपूज्य स्वामी विष्णु तीर्थजी महाराज हे सिद्धयोगाच्या तीर्थ परंपरेतील महान संत होते. त्यांनी तपश्चर्या, संन्यास, गुरुसेवा आणि शक्तिपात दीक्षेद्वारे असंख्य साधकांना आध्यात्मिक मार्गावर प्रेरित केले.

संपूर्ण चरित्र वाचा

परमपूज्य स्वामी विष्णु तीर्थजी महाराज यांचा जन्म 15 ऑक्टोबर 1888 रोजी झाला. बाल्यापासूनच त्यांचा स्वभाव गंभीर, अंतर्मुख आणि ईश्वराभिमुख होता. शिक्षण पूर्ण केल्यानंतरही त्यांच्या अंतःकरणातील वैराग्य अधिकाधिक प्रबळ होत गेले.

गुरुंच्या सान्निध्यात त्यांनी कठोर साधना केली आणि शक्तिपात योगाची अनुभूती प्राप्त केली. पुढे त्यांनी संन्यास स्वीकारून सिद्धयोगाच्या तीर्थ परंपरेचे कार्य समर्थपणे पुढे नेले.

त्यांनी साधकांना गुरुश्रद्धा, संयम, ध्यान, जप आणि सात्त्विक जीवनाचा मार्ग दाखवला. त्यांच्या कृपेने अनेक शिष्यांच्या अंतर्मनात आध्यात्मिक जागरणाची प्रक्रिया सुरू झाली.

1969 मध्ये त्यांनी देहत्याग केला. त्यांची परंपरा पुढे परमपूज्य स्वामी शिवोम तीर्थ महाराजांनी तेजस्वीपणे चालवली.

His Holiness Swami Vishnu Tirthji was a great saint of the Tirtha lineage of Siddhayoga. Through austerity, renunciation, guru-seva and Shaktipat initiation, he guided countless seekers toward spiritual awakening.

Read full biography

His Holiness Swami Vishnu Tirthji was born on 15 October 1888. From an early age he was serious, inward-looking and deeply inclined toward spiritual life. Even after completing his education, the call of renunciation continued to grow within him.

Under the guidance of his Guru he performed intense sadhana and attained realization in the path of Shaktipat Yoga. He later accepted sannyasa and carried forward the sacred Tirtha lineage of Siddhayoga.

He taught seekers the importance of devotion to the Guru, self-control, meditation, mantra-japa and a sattvic way of life. Through his grace, many disciples experienced the beginning of inner spiritual awakening.

He left his physical body in 1969. The lineage was carried forward with great radiance by His Holiness Swami Shivom Tirth Maharaj.