साधना में धैर्य, श्रद्धा और समर्पण

साधना में धैर्य, श्रद्धा और समर्पण

साधना कोई शीघ्र परिणाम देने वाली प्रतियोगिता नहीं, बल्कि आत्मपरिवर्तन की क्रमिक यात्रा है। श्रद्धा साधक को मार्ग से जोड़ती है, धैर्य कठिन समय में उसे स्थिर रखता है और समर्पण अहंकार के भार को कम करता है। समर्पण का अर्थ निष्क्रिय होना नहीं, बल्कि अपना पूरा प्रयास करके परिणाम गुरु और परमशक्ति पर छोड़ना है। इन तीन गुणों से साधना सहज, गहरी और स्थायी बनती है।

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साधना कोई शीघ्र परिणाम देने वाली प्रतियोगिता नहीं, बल्कि आत्मपरिवर्तन की क्रमिक यात्रा है। श्रद्धा साधक को मार्ग से जोड़ती है, धैर्य कठिन समय में उसे स्थिर रखता है और समर्पण अहंकार के भार को कम करता है। समर्पण का अर्थ निष्क्रिय होना नहीं, बल्कि अपना पूरा प्रयास करके परिणाम गुरु और परमशक्ति पर छोड़ना है। इन तीन गुणों से साधना सहज, गहरी और स्थायी बनती है।