शक्तिपात के बाद साधना कैसे करें?

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शक्तिपात के बाद साधना कैसे करें?

शक्तिपात दीक्षा के बाद साधक को किसी अनुभव के पीछे भागने के बजाय नियमित और शांत भाव से साधना करनी चाहिए। स्वच्छ तथा शांत स्थान पर निश्चित समय में बैठना उपयोगी होता है। साधना के दौरान होने वाली स्वाभाविक क्रियाओं को बलपूर्वक रोकना या अपनी ओर से उत्पन्न करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। साधक को गुरु द्वारा बताई गई विधि, संयमित दिनचर्या और सात्त्विक जीवन का पालन करना चाहिए।

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शक्तिपात दीक्षा के बाद साधक को किसी अनुभव के पीछे भागने के बजाय नियमित और शांत भाव से साधना करनी चाहिए। स्वच्छ तथा शांत स्थान पर निश्चित समय में बैठना उपयोगी होता है। साधना के दौरान होने वाली स्वाभाविक क्रियाओं को बलपूर्वक रोकना या अपनी ओर से उत्पन्न करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। साधक को गुरु द्वारा बताई गई विधि, संयमित दिनचर्या और सात्त्विक जीवन का पालन करना चाहिए।

शक्तिपातानंतर साधना कशी करावी?

शक्तिपात दीक्षेनंतर अनुभवांच्या मागे धावण्याऐवजी नियमित आणि शांतपणे साधना करावी. स्वच्छ व शांत ठिकाणी निश्चित वेळी बसणे उपयुक्त ठरते. साधनेत होणाऱ्या सहज क्रियांना जबरदस्तीने थांबवू नये किंवा कृत्रिमपणे निर्माण करू नये. गुरुंनी सांगितलेली पद्धत, संयमित दिनचर्या आणि सात्त्विक जीवन यांचे पालन करावे.

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शक्तिपात दीक्षेनंतर अनुभवांच्या मागे धावण्याऐवजी नियमित आणि शांतपणे साधना करावी. स्वच्छ व शांत ठिकाणी निश्चित वेळी बसणे उपयुक्त ठरते. साधनेत होणाऱ्या सहज क्रियांना जबरदस्तीने थांबवू नये किंवा कृत्रिमपणे निर्माण करू नये. गुरुंनी सांगितलेली पद्धत, संयमित दिनचर्या आणि सात्त्विक जीवन यांचे पालन करावे.

How Should One Practise after Shaktipat?

After Shaktipat initiation, the seeker should practise regularly and calmly instead of chasing experiences. Sitting at a fixed time in a clean and quiet place is helpful. Natural movements or processes arising during practice should neither be forcefully suppressed nor artificially produced. The seeker should follow the method given by the Guru, maintain a disciplined routine and live a sattvic life.

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After Shaktipat initiation, the seeker should practise regularly and calmly instead of chasing experiences. Sitting at a fixed time in a clean and quiet place is helpful. Natural movements or processes arising during practice should neither be forcefully suppressed nor artificially produced. The seeker should follow the method given by the Guru, maintain a disciplined routine and live a sattvic life.