4. कुण्डलिनी जागरण क्यों आवश्यक है?
4. कुण्डलिनी जागरण क्यों आवश्यक है?

मानव जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल भौतिक सुख-सुविधाएँ प्राप्त करना नहीं, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करना भी है। योग एवं वेदान्त के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के भीतर अनंत आध्यात्मिक शक्ति विद्यमान है, किंतु उसके सुप्त रहने के कारण मनुष्य अपनी पूर्ण क्षमता को पहचान नहीं पाता। इसी सुप्त शक्ति को जागृत करने की प्रक्रिया को कुण्डलिनी जागरण कहा जाता है।
जब यह शक्ति जागृत होती है, तब साधक के भीतर स्थित नकारात्मक संस्कार, मानसिक अशुद्धियाँ एवं आध्यात्मिक अवरोध धीरे-धीरे समाप्त होने लगते हैं। मन अधिक शांत, स्थिर और अंतर्मुखी बनता है। ध्यान सहज होने लगता है तथा साधना में गहराई आती है। साधक का दृष्टिकोण केवल बाहरी संसार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह अपने भीतर स्थित दिव्य चेतना का अनुभव करने लगता है।
सिद्ध महायोग परंपरा यह मानती है कि कुण्डलिनी जागरण का अंतिम उद्देश्य किसी अलौकिक शक्ति की प्राप्ति नहीं, बल्कि आत्मसाक्षात्कार है। यही कारण है कि इसे आध्यात्मिक जीवन की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया माना गया है।