श्री स्वामी नारायण देव तीर्थजी महाराज

श्री स्वामी नारायण देव तीर्थजी महाराज
श्री स्वामी नारायण देव तीर्थजी महाराज
Sri Swami Narayan Dev Tirthji
परमगुरु श्री स्वामी नारायण देव तीर्थजी शक्तिपात दीक्षा के माध्यम से कुंडलिनी जागरण की लुप्तप्राय दिव्य विद्या के पुनरुद्धारक और पुनर्जीवक के रूप में विख्यात हैं। उनका जन्म वर्ष 1870 में तत्कालीन पूर्वी भारत के बंगाल प्रदेश के मंड्रासर-बिनोटिया गाँव में एक साधारण परिवार में हुआ, जो आज बांग्लादेश का भाग है। उनके पिता का नाम तारिणी चरण गंगोपाध्याय तथा माता का नाम श्रीमती नवदुर्गा देवी था। उस समय की प्रचलित परंपरा के अनुसार उनका विवाह कम आयु में हुआ, किंतु बचपन से ही उनका झुकाव धार्मिक और आध्यात्मिक खोज की ओर था। उन्होंने पूर्वी बंगाल के फरीदपुर जिले के मदारीपुर में एक ध्यान केंद्र की स्थापना की और योग्य साधकों को…
पूरा परिचय पढ़ें
परमगुरु श्री स्वामी नारायण देव तीर्थजी शक्तिपात दीक्षा के माध्यम से कुंडलिनी जागरण की लुप्तप्राय दिव्य विद्या के पुनरुद्धारक और पुनर्जीवक के रूप में विख्यात हैं। उनका जन्म वर्ष 1870 में तत्कालीन पूर्वी भारत के बंगाल प्रदेश के मंड्रासर-बिनोटिया गाँव में एक साधारण परिवार में हुआ, जो आज बांग्लादेश का भाग है। उनके पिता का नाम तारिणी चरण गंगोपाध्याय तथा माता का नाम श्रीमती नवदुर्गा देवी था। उस समय की प्रचलित परंपरा के अनुसार उनका विवाह कम आयु में हुआ, किंतु बचपन से ही उनका झुकाव धार्मिक और आध्यात्मिक खोज की ओर था।
उन्होंने पूर्वी बंगाल के फरीदपुर जिले के मदारीपुर में एक ध्यान केंद्र की स्थापना की और योग्य साधकों को शक्तिपात दीक्षा प्रदान करना प्रारंभ किया। वे अपने शिष्यों से नियमित, अनुशासित और क्रमबद्ध साधना की अपेक्षा करते थे। उनका आग्रह था कि साधक सरल जीवन, उच्च विचार और जागरूक साक्षीभाव बनाए रखे। वे साधकों को प्रेरित करते थे कि जागृत दिव्य शक्ति के कार्यों में अनावश्यक हस्तक्षेप न करें, बल्कि उसके दिव्य प्रवाह के प्रति साक्षी बने रहें।
वे आध्यात्मिक सिद्धियों और अनुभवों के बाहरी प्रदर्शन के कठोर विरोधी थे। उन्होंने स्वामी पुरुषोत्तम तीर्थ तथा युवा ब्रह्मचारी दया, जो बाद में योगानंद ब्रह्मचारी के नाम से प्रसिद्ध हुए, को दीक्षित किया। उन्होंने स्वामी स्वयं ज्योति तीर्थ तथा शरत ब्रह्मचारी को भी दीक्षा प्रदान की। ऋषिकेश में उन्होंने श्री योगानंद ब्रह्मचारी के साथ कुछ समय निवास किया।
अप्रैल 1935 में लगभग 65 वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी पार्थिव देह का त्याग किया। उन्होंने योग्य साधकों के लिए शक्तिपात द्वारा कुंडलिनी जागरण का एक प्रभावी और गंभीर मार्ग स्थापित किया।
श्री स्वामी नारायण देव तीर्थजी महाराज हे सिद्ध महायोगाच्या अखंड गुरु-परंपरेतील महान संत आणि शक्तिपात योगाचे प्रभावी प्रचारक होते. त्यांचे जीवन गुरुसेवा, साधना, करुणा आणि शिष्यांच्या आध्यात्मिक उन्नतीसाठी समर्पित होते.
संपूर्ण चरित्र वाचा
श्री स्वामी नारायण देव तीर्थजी महाराज यांचा जन्म 1870 मध्ये तत्कालीन बंगालमधील बिनोतिया येथे धार्मिक कुटुंबात झाला. त्यांच्या मातोश्रींचे नाव नवदुर्गा आणि वडिलांचे नाव तारिणी चरण होते. बालपणापासूनच त्यांना ईश्वरभक्ती, साधना आणि संतसंगाची विशेष आवड होती.
गुरुकृपेने त्यांनी शक्तिपात साधनेचा सखोल अनुभव प्राप्त केला आणि पुढे या दिव्य परंपरेचे पुनरुज्जीवन करण्याचे महान कार्य केले. त्यांनी साधकांना नियमित ध्यान, संयम, गुरुश्रद्धा आणि अंतर्मुख साधनेवर भर देण्याची शिकवण दिली.
मदारीपूर येथील केंद्रातून त्यांनी असंख्य साधकांना मार्गदर्शन केले. शिष्यांच्या जीवनातील शिस्त, सात्त्विकता आणि साधनेतील सातत्य यांना ते अत्यंत महत्त्व देत असत. त्यांच्या कार्यामुळे शक्तिपात योगाची परंपरा पुढील पिढ्यांपर्यंत समर्थपणे पोहोचली.
एप्रिल 1935 मध्ये त्यांनी देहत्याग केला. आजही त्यांचे जीवन सिद्ध महायोगाच्या साधकांसाठी प्रेरणादायी दीपस्तंभ मानले जाते.
Sri Swami Narayan Dev Tirthji was a revered saint of the unbroken Siddha Mahayog lineage and a powerful exponent of Shaktipat Yoga. His life was dedicated to guru-seva, disciplined practice, compassion and the spiritual upliftment of seekers.
Read full biography
Sri Swami Narayan Dev Tirthji was born in 1870 at Binotia in the Bengal region, into a deeply religious family. His mother was Navadurga and his father was Tarini Charan. From childhood he was naturally drawn toward devotion, meditation and the company of saints.
Through the grace of his Guru, he attained deep experience in Shaktipat practice and later played a major role in reviving and preserving this sacred tradition. He emphasized regular meditation, self-discipline, devotion to the Guru and inward spiritual practice.
From the Madaripur centre he guided numerous seekers. He gave great importance to discipline, purity of conduct and continuity in sadhana. His work helped carry the stream of Shaktipat Yoga safely into future generations.
He left his physical body in April 1935. His life continues to inspire seekers of Siddha Mahayog.