परम पूज्य श्री 1008 स्वामी शिवोम तीर्थ महाराज

परम पूज्य श्री 1008 स्वामी शिवोम तीर्थ महाराज

परम पूज्य श्री 1008 स्वामी शिवोम तीर्थ महाराज

1924 – 6 अप्रैल 2008

परमपूज्य श्री १००८ स्वामी शिवोम तीर्थ महाराज

1924 – 6 एप्रिल 2008

His Holiness Swami Shivom Tirthji

1924 – 6 April 2008

स्वामी शिवोम तीर्थ महाराज सिद्धयोग की तीर्थ परंपरा के विख्यात गुरु थे। उनका जन्म वर्ष 1924 में तत्कालीन पंजाबी गुजरात के एक छोटे गाँव में हुआ, जो आज पाकिस्तान में है। संन्यास से पूर्व उनका नाम ओम प्रकाश था। उन्होंने लाहौर से स्नातक शिक्षा प्राप्त की और कुछ समय गृहस्थ जीवन व्यतीत किया। भारत विभाजन के बाद वे परिवार सहित भारत आए। स्वामी विष्णु तीर्थजी के संपर्क में आने के बाद उन्होंने आध्यात्मिक जीवन अपनाया। आश्रम सेवा, विनम्रता और साधना से प्रसन्न होकर गुरु ने उन्हें आगे की परंपरा के लिए तैयार किया। वर्ष 1959 में उन्हें ब्रह्मचर्य दीक्षा मिली और वे ब्रह्मचारी शिवोम प्रकाश कहलाए। वर्ष 1963 में उन्होंने काशी के…

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स्वामी शिवोम तीर्थ महाराज सिद्धयोग की तीर्थ परंपरा के विख्यात गुरु थे। उनका जन्म वर्ष 1924 में तत्कालीन पंजाबी गुजरात के एक छोटे गाँव में हुआ, जो आज पाकिस्तान में है। संन्यास से पूर्व उनका नाम ओम प्रकाश था। उन्होंने लाहौर से स्नातक शिक्षा प्राप्त की और कुछ समय गृहस्थ जीवन व्यतीत किया।

भारत विभाजन के बाद वे परिवार सहित भारत आए। स्वामी विष्णु तीर्थजी के संपर्क में आने के बाद उन्होंने आध्यात्मिक जीवन अपनाया। आश्रम सेवा, विनम्रता और साधना से प्रसन्न होकर गुरु ने उन्हें आगे की परंपरा के लिए तैयार किया। वर्ष 1959 में उन्हें ब्रह्मचर्य दीक्षा मिली और वे ब्रह्मचारी शिवोम प्रकाश कहलाए।

वर्ष 1963 में उन्होंने काशी के स्वामी नारायण तीर्थ से संन्यास दीक्षा प्राप्त की और स्वामी शिवोम तीर्थ नाम पाया। उन्होंने ऋषिकेश के योग श्री पीठ आश्रम और देवास के नारायण कुटी आश्रम की जिम्मेदारी संभाली। उत्तरकाल में वे इंदौर के निकट एकांत में रहकर अनेक ग्रंथ लिखते रहे।

6 अप्रैल 2008 को कोयंबटूर में उन्होंने देह त्याग किया और उनकी देह को ऋषिकेश में गंगा को समर्पित किया गया।

परमपूज्य श्री १००८ स्वामी शिवोम तीर्थ महाराज हे सिद्धयोगाच्या तीर्थ परंपरेतील विख्यात गुरु होते. आश्रमसेवा, साधना, ग्रंथलेखन आणि शक्तिपात परंपरेच्या प्रसारातून त्यांनी असंख्य साधकांना मार्गदर्शन केले.

संपूर्ण चरित्र वाचा

स्वामी शिवोम तीर्थ महाराजांचा जन्म 1924 मध्ये तत्कालीन पंजाबी गुजरातमधील एका गावात झाला, जे आज पाकिस्तानमध्ये आहे. संन्यासपूर्व त्यांचे नाव ओमप्रकाश होते. त्यांनी लाहोर येथे शिक्षण घेतले आणि काही काळ गृहस्थ जीवन व्यतीत केले.

भारताच्या फाळणीनंतर ते कुटुंबासह भारतात आले. परमपूज्य स्वामी विष्णु तीर्थजींच्या संपर्कात आल्यानंतर त्यांच्या जीवनाला आध्यात्मिक दिशा मिळाली. आश्रमसेवा, विनम्रता आणि साधनेमुळे गुरूंनी त्यांना पुढील परंपरेसाठी तयार केले.

1959 मध्ये त्यांना ब्रह्मचर्य दीक्षा मिळाली आणि ते ब्रह्मचारी शिवोम प्रकाश म्हणून ओळखले जाऊ लागले. 1963 मध्ये काशी येथे संन्यास दीक्षा प्राप्त करून त्यांना स्वामी शिवोम तीर्थ हे नाव मिळाले.

त्यांनी ऋषिकेश येथील योग श्री पीठ आणि देवास येथील नारायण कुटी आश्रमाची जबाबदारी सांभाळली. पुढील काळात त्यांनी अनेक महत्त्वपूर्ण आध्यात्मिक ग्रंथांची रचना केली.

6 एप्रिल 2008 रोजी कोयंबतूर येथे त्यांनी देहत्याग केला. त्यांचे जीवन आजही सिद्ध महायोग साधकांना प्रेरणा देते.

His Holiness Swami Shivom Tirthji was a distinguished master of the Tirtha lineage of Siddhayoga. Through ashram service, spiritual practice, writing and the transmission of Shaktipat, he guided countless seekers.

Read full biography

Swami Shivom Tirth Maharaj was born in 1924 in a village of the Punjab-Gujarat region, now in Pakistan. Before renunciation his name was Om Prakash. He studied in Lahore and lived a householder’s life for some time.

After the Partition of India he came to India with his family. His meeting with His Holiness Swami Vishnu Tirthji transformed the direction of his life. Through humility, service and disciplined practice, he was prepared to carry forward the lineage.

In 1959 he received brahmacharya initiation and became known as Brahmachari Shivom Prakash. In 1963 he received sannyasa initiation in Kashi and was given the name Swami Shivom Tirth.

He served the Yog Shri Peeth Ashram in Rishikesh and Narayan Kuti Ashram in Dewas. In his later years he also authored several important spiritual works.

He left his physical body on 6 April 2008 in Coimbatore. His life and teachings continue to inspire practitioners of Siddha Mahayog.